
लालकुआ
रिपोर्टर -मजहिर खान
लालकुआँ क्षेत्र के हल्दूचौड स्थित एक निजी कार्यालय पर आयोजित प्रेसवार्ता में गौ सेवक विनोद भट्ट ने कहा कि देवभूमि में एक ओर गौ माता को आस्था और संस्कृति का केंद्र माना जाता है, तो दूसरी ओर सड़कों पर भटकती, दुर्घटनाओं का शिकार होती और कूड़े में भोजन तलाशता गौवंश व्यवस्था पर करारा सवाल खड़ा कर रहा है। उन्होंने सरकार से गौ माता को “राष्ट्र माता”का संवैधानिक दर्जा देने की मांग उठाई।
उन्होंने ने कहा कि यदि गौ माता भारतीय सभ्यता, कृषि व्यवस्था और सनातन परंपरा की आधारशिला हैं, तो फिर वर्तमान में उनकी यह दुर्दशा क्यों? “सड़कों पर दम तोड़ती गायें हमारी संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुकी हैं। केवल नारे नहीं, ठोस नीति और कानूनी संरक्षण की जरूरत है,”

उन्होंने केंद्र सरकार से गौ माता को “राष्ट्र माता” और उत्तराखंड सरकार से “राज्य माता” का दर्जा देकर सशक्त कानून बनाने की मांग दोहराई। उनके अनुसार यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान और नैतिक जिम्मेदारी का विषय है।
उन्होंने बताया कि वे हरिद्वार से देहरादून तक दंडवत यात्रा कर चुके हैं और देहरादून में आमरण अनशन के माध्यम से भी सरकार का ध्यान आकर्षित किया। उनका कहना है कि यह संघर्ष सत्ता विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था जागरण का प्रयास है।
“राजनीति नहीं, राष्ट्रधर्म का विषय” है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि गौ माता का सम्मान किसी दल या विचारधारा से ऊपर है। “जब तक गौवंश सुरक्षित नहीं होगा, तब तक हमारी संस्कृति सुरक्षित नहीं मानी जा सकती ।
उन्होंने सरकार को चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि सूबे के पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा समेत 36 विधायक मुख्यमंत्री को समर्थन पत्र भेज चुके हैं। इसके अलावा जनप्रतिनिधि भी उनकी मांग को लेकर उनके साथ है
उन्होंने, सरकार से आगामी विधानसभा सत्र में इस प्रस्ताव को सदन में लाने की मांग दोहराई है।
उन्होंने कहा कि जब तक गौशालाओं की स्थिति सुदृढ़ नहीं होगी और बेसहारा गौवंश के लिए स्थायी नीति नहीं बनेगी, तब तक सम्मान केवल शब्दों तक सीमित रहेगा।
युवाओं से भावनात्मक आह्वान
उन्होंने युवाओं से आगे आने की अपील करते हुए कहा कि गौ सेवा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा राष्ट्रीय दायित्व है।
हल्दूचौड़ की इस प्रेस वार्ता ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है — क्या गौ माता केवल मंचों तक सीमित रहेंगी या उन्हें वास्तविक संरक्षण मिलेगा? यदि सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह जनभावना व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकती है।




