मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की जन्मशताब्दी: सरहदों से परे गूंजती वह आवाज़, जो आज भी दिलों पर राज करती है !!

सहारनपुर
✍️फहीम अहमद राज़ सहारनपुरी
हिंदुस्तान और पाकिस्तान की साझा सांस्कृतिक विरासत में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें किसी एक देश या सरहद में बांधना संभव नहीं। मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ उन्हीं महान कलाकारों में से एक थीं, जिनकी आवाज़ ने हिंदुस्तान में भी करोड़ों दिलों पर राज किया और पाकिस्तान में भी उन्हें गायकी की मलिका का दर्जा मिला। 21 सितंबर 1926 को पंजाब के कसूर में जन्मीं नूरजहाँ की 100वीं जन्मशताब्दी के अवसर पर दोनों देशों में उनके चाहने वाले उन्हें याद कर रहे हैं। उनका असली नाम अल्लाह वसई था। संगीत से जुड़े परिवार में जन्म लेने वाली नूरजहाँ ने बेहद कम उम्र में गायकी की दुनिया में कदम रख दिया था। उनके पिता मदद अली और माता फतेह बीबी थे। बचपन से ही उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास और आकर्षण था कि परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया। उन्होंने छोटी उम्र में ही संगीत का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था और आगे चलकर शास्त्रीय संगीत की बारीकियां भी सीखीं।
नूरजहाँ का फिल्मी सफर उस समय शुरू हुआ जब वह बाल कलाकार थीं। कलकत्ता और बाद में बंबई की फिल्मी दुनिया में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। उन्हें ‘बेबी नूरजहाँ’ के नाम से भी जाना जाता था। 1942 में फिल्म ‘खानदान’ में मुख्य भूमिका ने उन्हें हिंदुस्तान की बड़ी फिल्म अभिनेत्रियों और गायिकाओं की कतार में ला खड़ा किया। इसके बाद ‘बड़ी माँ’, ‘ज़ीनत’, ‘गाँव की गोरी’, ‘अनमोल घड़ी’, ‘मिर्ज़ा साहिबान’ और ‘जुगनू’ जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयां दीं। 1947 में आई फिल्म ‘जुगनू’ में उनके साथ दिलीप कुमार ने भी अभिनय किया था। उस दौर में नूरजहाँ केवल अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि अपनी आवाज़ के कारण भी फिल्म जगत में एक अलग मुकाम हासिल कर चुकी थीं।

नूरजहाँ का निजी जीवन भी फिल्मी दुनिया की तरह ही चर्चित रहा। उनका पहला विवाह फिल्म निर्देशक शौकत हुसैन रिज़वी से हुआ। दोनों ने फिल्मों में साथ काम किया और उनका नाम उस दौर की चर्चित फिल्मी जोड़ियों में शामिल हुआ। बाद में दोनों अलग हो गए। इसके बाद नूरजहाँ ने अभिनेता एजाज़ दुर्रानी से विवाह किया। उनके पारिवारिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन इन सबके बीच उनकी कला का सफर लगातार आगे बढ़ता रहा।
1947 का भारत-विभाजन नूरजहाँ की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। वह अपने पति शौकत हुसैन रिज़वी के साथ पाकिस्तान चली गईं। हिंदुस्तान में जिस फिल्मी दुनिया ने उन्हें स्टार बनाया था, उसे छोड़कर नए देश में अपने लिए नई जमीन तैयार करना आसान नहीं था, लेकिन नूरजहाँ ने वहां भी अपनी प्रतिभा का ऐसा परिचय दिया कि वह पाकिस्तान की सबसे बड़ी गायिकाओं में शामिल हो गईं। उन्होंने केवल अभिनय और गायकी ही नहीं की, बल्कि फिल्म निर्माण और निर्देशन में भी योगदान दिया। 1951 में ‘चन्न वे’ के माध्यम से वह पाकिस्तान की शुरुआती महिला फिल्म निर्देशकों में शामिल हुईं।
पाकिस्तान जाने के बाद भी नूरजहाँ का रिश्ता हिंदुस्तान से कभी खत्म नहीं हुआ। उनकी आवाज़ भारतीय संगीत प्रेमियों के बीच लगातार सुनी जाती रही। लंबे अंतराल के बाद 1982 में जब नूरजहाँ भारत आईं तो उनका जिस गर्मजोशी से स्वागत हुआ, वह इस बात का प्रमाण था कि कलाकारों के रिश्ते राजनीतिक सरहदों से कहीं बड़े होते हैं। उन्होंने दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की और मुंबई में अपने पुराने साथियों तथा प्रशंसकों से मिलीं। दिलीप कुमार ने उनका आत्मीय स्वागत किया और बॉलीवुड के अनेक कलाकारों ने उनसे मुलाकात की। उस समय ऐसा लगा मानो दशकों पुरानी कोई बिछड़ी हुई आवाज़ अपने पुराने घर लौट आई हो।
नूरजहाँ और लता मंगेशकर की दोस्ती और एक-दूसरे के प्रति सम्मान भी संगीत की दुनिया की बेहद खूबसूरत कहानी है। दोनों अपने-अपने दौर की महान गायिकाएं थीं, लेकिन उनके बीच प्रतिस्पर्धा से अधिक एक-दूसरे की कला के लिए सम्मान था। लता मंगेशकर ने कई मौकों पर नूरजहाँ की गायकी को याद किया और बताया कि नूरजहाँ की आवाज़ और गायकी से वह बेहद प्रभावित थीं। नूरजहाँ भी लता जी की प्रतिभा की बहुत कद्र करती थीं। दोनों की मुलाकातों में संगीत और पुरानी यादों की आत्मीयता दिखाई देती थी। यही वजह है कि दोनों का नाम दक्षिण एशिया के फिल्म संगीत के इतिहास में एक-दूसरे से जुड़े हुए दो महान अध्यायों के रूप में लिया जाता है।
पाकिस्तान में नूरजहाँ को ‘मलिका-ए-तरन्नुम’ का सम्मान मिला। उन्होंने उर्दू, पंजाबी और अन्य भाषाओं में हजारों गीत गाए। उनकी आवाज़ में दर्द भी था, मिठास भी, ठहराव भी और ऐसी बुलंदी भी जो सीधे सुनने वाले के दिल तक पहुंचती थी। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनके देशभक्ति गीत पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय हुए और उनकी आवाज़ उस दौर की राष्ट्रीय भावनाओं का हिस्सा बन गई। फिल्मों में उनके अभिनय और गायकी के अलावा गजल, ठुमरी और अन्य संगीत विधाओं पर भी उनकी पकड़ थी। उनकी गायकी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह शब्दों को केवल गाती नहीं थीं, बल्कि उनमें भावनाओं को इस तरह उतार देती थीं कि गीत सुनने वाले को अपनी कहानी लगने लगता था।
नूरजहाँ को उनके कला-सफर के दौरान अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिले। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस, तमगा-ए-इम्तियाज़ और सितारा-ए-इम्तियाज़ जैसे सम्मान प्रदान किए। लेकिन शायद उनका सबसे बड़ा सम्मान उनके चाहने वालों की वह मोहब्बत थी, जो उनके जीवनकाल में भी मिली और उनके निधन के बाद भी कम नहीं हुई।
जीवन के अंतिम वर्षों में नूरजहाँ का स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा था। उन्हें हृदय संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा और बाद के वर्षों में उनकी किडनी भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। दिसंबर 2000 में उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया। 23 दिसंबर 2000 को दिल का दौरा पड़ने से इस महान कलाकार का निधन हो गया। उन्हें कराची के गिज़री कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके निधन से संगीत और सिनेमा की दुनिया में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसे आज तक भरा नहीं जा सका।
नूरजहाँ की जिंदगी केवल एक महान गायिका और अभिनेत्री की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साझा हिंदुस्तानी संस्कृति की कहानी भी है, जिसे 1947 की सरहदें अलग नहीं कर सकीं। वह कसूर में पैदा हुईं, कलकत्ता और बंबई में अपनी पहचान बनाई, हिंदुस्तानी सिनेमा की बुलंदियों को छुआ और पाकिस्तान जाकर वहां की फिल्म और संगीत दुनिया की सबसे बड़ी हस्तियों में शामिल हो गईं। आज उनकी जन्मशताब्दी पर उन्हें याद करना केवल एक कलाकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की उस साझा संगीत विरासत को सलाम करना है, जिसमें सुरों की कोई सरहद नहीं होती।
मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी मौजूद है। उनकी गायकी की मिठास, उनकी अदाकारी की चमक और उनकी आवाज़ में मौजूद दर्द आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी ओर खींचता रहेगा। सौ वर्ष बाद भी यदि किसी कलाकार को हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों जगह समान सम्मान और मोहब्बत से याद किया जाता है, तो यह उस कलाकार की महानता का सबसे बड़ा प्रमाण है।




