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अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ संपन्न, तीन दिन हुआ सनातन, योग, आयुर्वेद, एआई पर मंथन !!

आचार्य बालकृष्ण को ‘महामहोपाध्याय’, साध्वी देवप्रिया ‘महाआचार्या’ सम्मान, डॉ. शिवानी वी. को व्याकरण पण्डिता सम्मान !

हरिद्वार, 31 अक्टूबर

पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन ऐतिहासिक उपलब्धियों और व्यापक सहभागिता के साथ संपन्न हुआ। पतंजलि विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं भारतीय विद्वत् परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत भाषा, योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, सनातन संस्कृति एवं प्राच्य विद्याओं के संरक्षण, संवर्धन तथा आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में उनके समावेश पर व्यापक विमर्श हुआ।

समापन समारोह में प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा, योगगुरु स्वामी रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण सहित देशभर से आए संत, धर्माचार्य, शिक्षाविद् एवं विद्वान उपस्थित रहे। इस अवसर पर 24 विद्वानों एवं शोधार्थियों सहित उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित किया गया तथा 35 पुस्तकों का विमोचन हुआ।

अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के अध्यक्ष श्रीनिवास वरखेड़ी जी ने परम पूज्य स्वामी जी महाराज को विद्याधिपति-प्रशस्ति-पत्रम् भेंट कर सम्मानित किया। संस्कृत, योगशास्त्र, आयुर्वेद एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान के लिए आचार्य बालकृष्ण को ‘महामहोपाध्याय’ की प्रतिष्ठित उपाधि से सम्मानित किया गया। पतंजलि विवि की प्रति कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया को जी महाआचार्या सम्मान से विभूषित किया गया। व्याकरण के क्षेत्र में विशिष्ट विद्वत्ता एवं योगदान के लिए डॉ. शिवानी को ‘व्याकरण पण्डिता पुरस्कार’ प्रदान किया गया। वहीं, डॉ. कविता होले को उनकी विद्वत्ता एवं विशेषज्ञता के लिए सम्मानित किया गया। विभिन्न विषय-वर्गों में उत्कृष्ट शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले 24 विद्वानों एवं शोधार्थियों को सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र पुरस्कार प्रदान किए गए। अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन में नवनियुक्त अध्यक्ष प्रोफेसर अरुण रंजन मिश्रा को मनोनीत किया गया। सम्मेलन में अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के नवनियुक्त अध्यक्ष प्रो. अरुण रंजन मिश्रा सहित विभिन्न विद्वानों एवं पदाधिकारियों का भी अभिनंदन किया गया। संस्कृत विद्वान कविराज मनोहर लाल आर्य जी काे भी सम्मानित किया गया। इस अवसर पर संस्कृत भाषा, भारतीय शास्त्रों एवं सनातन परंपरा के संरक्षण और संवर्धन में विद्वानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।

 

*ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियां नहीं, गुण एवं कर्म के प्रतीक : स्वामी रामदेव*

योगगुरु स्वामी रामदेव ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र को केवल जातियों के रूप में सीमित करके नहीं देखना चाहिए, बल्कि इन्हें मनुष्य के गुणों, कर्मों एवं चरित्र के विभिन्न आयामों के रूप में व्यापक दृष्टिकोण से समझना चाहिए। स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रीय पहचान के महत्व पर कहा कि भारत को अपनी प्राचीन कालगणना परंपरा विक्रम संवत कैलेंडर को अपनाना चाहिए। भारतीय पंचांग एवं विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में अधिक व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

स्वामी जी ने कहा कि सनातन संस्कृति केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि अहिंसा, सत्य, सद्भाव और मानव कल्याण का जीवन दर्शन है। स्वामी जी ने वर्तमान विदेशी शिक्षा पद्धति की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि इसके प्रभाव से हमारी पीढ़ियों में रोग, वैचारिक विकार, संकीर्णता और सांस्कृतिक विद्रूपता जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वस्थ विचार, व्यापक दृष्टिकोण, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का विकास करना भी होना चाहिए। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा एवं सनातन जीवन मूल्यों को शिक्षा व्यवस्था में समुचित स्थान दिया जाना आवश्यक है।

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*सनातन पर इतिहास बनते दुनियां ने देखा: आचार्य बालकृष्ण*

श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि दो दिनों में जो सुना, देखा वह अद्भूत रहा। एक जीवन तो क्या कई जीवन लग जायेंगे इसे सीखने और समझने में। सम्मेलन में सनातन को लेकर पतंजलि में इतिहास रचा गया। देश के संतों ने ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ का गठन किया गया, इसे दुनिया ने देखा, यह आसान काम नहीं था। सभी संतों यानि अलग-अलग मत, पंथ के संतों को एक जगह एकत्रित करना और निर्विवाद कार्य संपन्न होना, यह बहुत बड़ा काम था। जीवन के लिए यह क्षण अविस्मरणीय है। उन्होंने कहा कि यह पहली घटना होगी 52 वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन की जहां सभी सुबह नौ बजे से रात तक यानि करीब 13 घंटे तक बैठे रहे। यह लगता है कि कहीं गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड की बात न हो जाये।

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*सनातन दर्शन में निहित है समग्र मानव कल्याण और प्रकृति संरक्षण का संदेश : एनपी सिंह*

भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष श्री एनपी सिंह ने कहा कि सनातन दर्शन केवल आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन, समाज, प्रकृति और समग्र मानव कल्याण का व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच समन्वय स्थापित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के आदर्शों तथा सनातन मूल्यों के व्यापक सामाजिक संदर्भ पर भी विचार रखे।

*गुरुकुल शिक्षा को राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने की जरूरत : स्वामी आनंद स्वरूप*

समापन समारोह में पहुंचे शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने गुरुकुल शिक्षा को राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा व्यवस्था विकसित करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि 8 से 11 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को गुरुकुल आधारित शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने पतंजलि विश्वविद्यालय एवं भारतीय शिक्षा बोर्ड के प्रयासों की सराहना करते हुए अपने दो विद्यालयों को भारतीय शिक्षा बोर्ड से संबद्ध कराने की घोषणा !

*पतंजलि में बच्चों को मिल रहे संस्कार किसी स्वप्न के साकार होने जैसे : प्रदीप बत्रा*

सम्मेलन के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा ने कहा कि वे पिछले कई वर्षों से पतंजलि से जुड़े हुए हैं। पतंजलि की विचारधारा, कार्यशैली और यहां हो रहे विकास कार्यों को देखकर वे अत्यंत प्रसन्न एवं गौरवान्वित महसूस करते हैं। उन्होंने कहा कि यहां बच्चों को जिस प्रकार की शिक्षा और संस्कार दिए जा रहे हैं, वह किसी स्वप्न के साकार होने जैसा है। उनकी इच्छा है कि देश के अन्य लोग और संस्थान भी इस आदर्श को अपनाएं और इससे प्रेरणा लें। उन्होंने कहा कि हमें मिलकर सनातन धर्म, वैदिक परंपराओं तथा भारत के गौरवशाली इतिहास एवं संस्कृति को और अधिक प्रखर बनाना चाहिए!

*26 राज्यों के 1,800 प्रतिभागियों ने की सहभागिता*

सम्मेलन में देश के 26 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों से लगभग 1,800 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। इनमें 552 शिक्षक एवं प्राध्यापक, 467 शोधार्थी, 403 विद्यार्थी तथा 378 अन्य प्रतिभागी शामिल रहे। सम्मेलन में 32 कुलपतियों, 40 से अधिक संतों, 90 से अधिक विद्वानों तथा विभिन्न शैक्षणिक एवं आयोजन समितियों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही।

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*पांच नए शोध विषय-वर्ग जुड़े, तीन नई पुरस्कार श्रेणियों की शुरुआत*

सम्मेलन की महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धियों में शोधपत्र प्रस्तुतिकरण के लिए पांच नए विषय-वर्गों को शामिल करना उल्लेखनीय रहा। इनमें कुंभ रहस्यम्, भारतीय ज्ञान प्रणाली, भारतीय अनुसंधान पद्धति, बाल साहित्य तथा प्राच्यविद्या का पुनरावलोकन शामिल हैं। इन विषयों के समावेश से भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर शोध एवं अकादमिक विमर्श का दायरा और व्यापक हुआ। इसके अतिरिक्त पतंजलि विश्वविद्यालय की ओर से प्रतिवर्ष तीन नई पुरस्कार श्रेणियां प्रायोजित करने की पहल की गई, जिनका शुभारंभ इसी सम्मेलन से हुआ।

*स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने किया विद्वानों का सम्मान*

समापन समारोह में भारतीय विद्वत् परिषद के विद्वान प्रो. वीर नारायण पाण्डुरंगी का स्वामी रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण ने अभिनंदन एवं सम्मान किया। इसी क्रम में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी को भी सम्मानित किया गया। सम्मान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए प्रो. वरखेड़ी ने स्वामी रामदेव को स्मृति चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं शॉल भेंट कर उनका अभिमान

*35 पुस्तकों का विमोचन, 92 पुस्तक एवं प्रदर्शनी स्टॉल बने आकर्षण*

आचार्य बालकृष्ण ने अपने संबोधन में बताया कि सम्मेलन के दौरान कुल 35 पुस्तकों का विमोचन किया गया। इन पुस्तकों में भारतीय ज्ञान परंपरा, योग, आयुर्वेद, संस्कृत साहित्य, दर्शन एवं प्राच्य विद्याओं से जुड़े विषयों को विशेष स्थान दिया गया।

सम्मेलन में 23 विषय-वर्गों के अंतर्गत शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इसके अतिरिक्त 92 पुस्तक एवं प्रदर्शनी स्टॉल लगाए गए, जिनमें विभिन्न प्रकाशकों, संस्थानों एवं प्रायोजकों ने सहभागिता की। इन स्टॉलों के माध्यम से विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं विद्वानों को भारतीय शास्त्रों, संस्कृत साहित्य तथा नवीन शोध प्रकाशनों से परिचित होने का अवसर मिला। प्रदर्शनी रविवार को भी जारी रहेगी।

*कुलपति सम्मेलन में उच्च शिक्षा एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली पर मंथन*

सम्मेलन के अंतिम दिन कुलपति सम्मेलन आयोजित किया गया। पूज्य स्वामी आर्षदेव एवं डॉ. गौतम आर. के. के समन्वय में आयोजित इस बैठक में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों एवं वरिष्ठ शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को उच्च शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने, संस्कृत एवं प्राच्य विद्याओं के अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित करने तथा विश्वविद्यालयों के बीच अकादमिक सहयोग बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया। बैठक में भारतीय अनुसंधान पद्धति, पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान एवं भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अधिक शोधोन्मुख बनाने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।

*साध्वी देवप्रिया ने प्रस्तुत की तीन दिवसीय सम्मेलन की विस्तृत आख्या*

विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति पूज्य दीदी साध्वी देवप्रिया ने सम्मेलन के संपूर्ण आयोजन की विस्तृत आख्या प्रस्तुत की। उन्होंने तीन दिनों के दौरान आयोजित शैक्षणिक, शोधपरक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों, देशभर से आए विद्वानों की सहभागिता तथा सम्मेलन से प्राप्त उपलब्धियों एवं निष्कर्षों का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने संत सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श तथा संत-महात्माओं द्वारा प्रस्तुत सुझावों का सार भी रखा। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल एक शैक्षणिक सम्मेलन नहीं, बल्कि संतों, विद्वानों, शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों को एक मंच पर लाकर भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन एवं पुनर्स्थापन की दिशा में ऐतिहासिक पहल रहा है। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में आचार्य बालकृष्ण के निरंतर मार्गदर्शन, प्रेरणा एवं सहयोग के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर उनका विशेष अभिनंदन एवं सम्मान भी किया गया।

*100 से अधिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां*

सम्मेलन के दौरान विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक टीम एवं विद्यार्थियों ने भारतीय संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों ने अतिथियों, संतों एवं विद्वानों का मन मोह लिया। तीन दिवसीय आयोजन में 100 से अधिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं गतिविधियों के माध्यम से भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत की विविधता को प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने पतंजलि परिवार के अभिन्न सदस्य तथा सम्मेलन के मुख्य आयोजक श्री ललित पोफलिया जी के सुपुत्र श्री हर्षद पोफलिया, सह-आयोजक श्रीकांत बड़वे जी, तथा श्री राहुल राठी जी का आभार जताया।

प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. आचार्या देवप्रिया जी ने मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. मयंक अग्रवाल जी, दूरस्थ शिक्षा विभाग के निदेशक प्रो. सत्येंद्र मित्तल, कुलसचिव डॉ. ऋत्विक सहाय बिसारिया, विज्ञान संकायाध्यक्ष डॉ. ए.के. सिंह, उप-कुलसचिव डॉ. निर्विकार सहित सभी शिक्षकों, विभागाध्यक्षों, संकाय सदस्यों, कार्यक्रम समन्वयकों, कर्मचारियों, आयोजन समितियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। विशेष रूप से उन शिक्षक समन्वयकों एवं विद्यार्थियों की सराहना की गई, जिन्होंने दिन-रात परिश्रम करते हुए अतिथि सत्कार, पंजीकरण, शैक्षणिक सत्रों, शोधपत्र प्रस्तुतिकरण, आवास, भोजन, मंच संचालन, तकनीकी व्यवस्था एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों सहित प्रत्येक दायित्व का पूरी निष्ठा से निर्वहन किया।

विश्वविद्यालय परिवार ने कहा कि इस ऐतिहासिक आयोजन की सफलता प्रत्येक शिक्षक, समन्वयक एवं विद्यार्थी के सामूहिक प्रयास, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा का परिणाम है।

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