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प्राचीन ज्ञान सम्पदा के संरक्षण, संवर्धन और समकालीन जीवन में उसकी प्रासंगिकता को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है यह सम्मेलन : राज्यपाल डॉ. बिसेन !

अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन कोई अकादमिक उत्सव नहीं, सनातन के गौरव को पुन: प्रतिष्ठापित करने हेतु एक युगान्तरकारी संकल्प का प्रारंभ !

हरिद्वार, 29 अक्टूबर  26

पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित त्रिदिवसीय 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति परम श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज तथा कुलपति परम पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का पावन सान्निध्य रहा।

कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल महोदय ने संदेश देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर विवेक, समाज में सद्भाव तथा सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति कल्याणकारी दृष्टि का विकास करना है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन हमारी प्राचीन ज्ञान सम्पदा के संरक्षण, संवर्धन और समकालीन जीवन में उसकी प्रासंगिकता को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है। इस 52वें अधिवेशन में देश-विदेश के विद्वानों की सहभागिता भारतीय मनीषा की अमूल्य धरोहर के प्रति व्यापक रूचि को दर्शाती है। उन्होंने विश्वास जताया कि यहाँ होने वाला विद्वत संवाद शोध विमर्श और भारतीय विचारों का आदान-प्रदान भारतीय ज्ञान परंपरा और अध्ययन को नई दिशा प्रदान करेगा। आज इस अवसर पर भारतीय दर्शनों का इतिहास एवं मीमांसा, वेदामृत एवं भारतीय दर्शन बोध जैसी कृतियों का लोकार्पण भी भारतीय ज्ञान साधना की समृद्ध परंपरा को समृद्ध करने का प्रयास है।

राज्यपाल ने कहा कि भारतीय चिंतन की यह विशेषता है कि यहाँ ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक उन्नति नहीं अपितु व्यक्ति के सामाजिक चरित्र, व्यवहार और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी परिष्कार रहा है। हमारे आचार्यों ने व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, परा-विद्या, ज्योतिष, आयुर्वेद, योग, वास्तु, दर्शन आदि अनेक क्षेत्रों में योगदान दिया है। महर्षि पाणिनी की व्याकरण परंपरा, महर्षि पतंजलि का योगदर्शन एवं आयुर्वेद की समृद्धशाली परंपरा भारतीय बौद्धिक सामर्थ्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

सम्मेलन में पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति परम श्रद्धेय स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि तीस अक्टूबर को सम्मेलन में भारत विद्वत परिषद, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, अखाड़ों के प्रमुख, जगतगुरू रामानन्दाचार्य, जगद्गुरु शंकराचार्य, जगद्गुरु रामानुजाचार्य, आदिगुरु शंकराचार्य के प्रतिनिधियों से लेकर भारत की समस्त गुरू परंपरा के प्रतिनिधि इस सम्मेलन में स्वयं भाग लेंगे या ऑनलाइन जुड़ेंगे।

*शीर्ष संतों के मार्गदर्शन में होगा सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान का शुभारंभ*

स्वामी जी ने कहा कि कुछ लोग अज्ञान और अविवेक के कारण सनातन के खंडित रूप को प्रस्तुत कर रहे हैं, ऐसा कहने से कि मंदिर में ही भगवान हैं, भगवान का रूप खंडित हो जाता है, भगवान तो सर्वत्र हैं, भगवान को समग्र रूप में ही देखना है। आज एआई (AI) का जमाना है, कुछ लोग सनातन को खंडित रूप में प्रस्तुत करते हैं, शास्त्रों की गलत व्याख्या करते हैं। कोई कहता है कि श्रीराम तथा माता सीता ने मांस भक्षण व मद्यपान किया। कुछ मुर्ख, धूर्त लोगों द्वारा किए गए व्याख्यान की वजह से, कुछ संस्थानों ने किताबें छाप दी। इससे मर्यादा पुरुषोत्तम राम की मर्यादा कहाँ रह गई, सीता का तप और सतीत्व कहाँ रह गया। योगेश्वर भगवान कृष्ण को रासलीला के नाम पर जाने क्या-क्या लिखा है, उस वीभत्सता तो कोई पढ़ भी नहीं सकता। ऐसे ही शिव जी नशेड़ी, गजेंडी कह दिया, शिव पर तो छल के साथ चढ़ाया गया जल भी स्वीकार नहीं होता, तो भांग, धतूरा क्यों चढ़ाते हो।

ऐसे ही ऋषि-ऋषिकाओं और देवी देवताओं का भी अपमान किया गया है।

सनातन विरोधी प्रतिदिन हमें अप्रसांगिक, अवैज्ञानिक, अव्यवहारिक और मुर्ख कहकर हमारा मजाक उड़ाते हैं। लेकिन हमने तय किया है कि अब कोई सनातन का उपहास नहीं उड़ा सकेगा। यह पुरुषार्थ पतंजलि से किया जायेगा। किसी भी कारण से किसी ने कोई गलत व्याख्या की है, कोई प्रक्षेप (मिलावट) की है, पूर्वजों की महान कृतियों पर लांछन लगाया गया है तो उसे पतंजलि से शुद्ध किया जाएगा। उनके कारण ही महान सनातन धर्म हमारे बीच है। स्वामी जी ने कहा कि चारों वेद, रामायण-महाभारत, सभी पुराण, राम-कृष्ण व शिव हमारे भीतर ही हैं, हम वेदों को जीने वाले हैं, हम रामत्व, कृष्णत्व व शिवत्व को जीते हैं। हम सबको सनातन का विग्रहवान स्वरूप होना है। आने वाले समय में सनातन अपने शुद्धत्म स्वरूप में आयेगा। यदि कोई सनातन के ऊपर प्रश्न उठाएगा तो कानूनी दृष्टि से भी दंडित करायेंगे। हमारे देश का संविधान ये कहता है कि यहां कोई भेदभाव नहीं हो सकता। “वी आर द पीपुल ऑफ इंडिया”, “वी आर द पीपुल ऑफ आर्याव्रत और भारतवर्ष”। हम भारत के सब नागरिक समान हैं। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, एससी-एसटी, ओबीसी दलित, शोषित, आदिवासी सब एक हैं। हम सब एक ही ब्रह्म की संतान हैं। कोई भी व्यक्ति हमारे भगवान, सनातन धर्म व संस्कृति पर प्रश्न कैसे उठा सकता है। हमें संकीर्ण भाव के साथ नहीं जीना है, अपने को खंडित करके नहीं जीना है कि मैं किसी की पत्नी हूं, मैं किसी का पति हूं, मैं ब्राह्मण हूं, मैं क्षत्रीय हूं, ये खंडित व्यक्तिव है। जिसने भी वेद पढ़ा है वह ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय को खंडित नहीं देखता। वह कहता है मेरे भीतर ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र हैं, मेरे भीतर चार वेद हैं, पूरा ब्रह्ममांड है।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि लोग मुझसे कोई पूछते हैं कि आपकी जाति क्या है? आप ब्राह्मण, क्षत्रीय, ओबीसी, वैश्य, एससी-एसटी, आदिवासी क्या हो? हमारा यही जवाब होता है कि पहले तो हम भारतवासी हैं, मनुष्य हैं, अपमान को मिटाते हैं इसलिए ब्राह्मण हैं, अन्याय को मिटाते हैं इसलिए क्षत्रीय हैं, अभाव को मिटाते हैं इसलिए वैश्य हैं और सेवा करते हैं इसलिए शुद्र ही नहीं महाशूद्र हैं। हम भारत का संविधान, लोकतंत्र व स्वयं भारत हैं, हम

में वेद हैं, सनातन है, हमारे भीतर भारत बसता है। स्वामी जी ने कहा कि इस सम्मेलन में देश-विदेश से विद्यार्थी शोध और अध्ययन के लिए आये हैं, हमारा उद्देश्य भारतीय शिक्षा बोर्ड के जरिये मैकाले की शिक्षा से भारत को मुक्त कराना है।

सम्मेलन में परम पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन कोई अकादमिक उत्सव नहीं, अपितु श्रद्धेय स्वामी जी के नेतृत्व में जिस इतिहास को हम यहाँ पर लिखने जा रहे हैं, यह सनातन के उस गौरव को पुन: प्रतिष्ठापित करने हेतु एक युगान्तरकारी संकल्प का प्रारंभ है। आचार्य जी ने कहा कि यहाँ संस्कृति, शास्त्र और समय के साथ-साथ हमारे शास्त्रों में बढ़ रहे वैचारिक प्रदूषण के विषय में बात होगी। उन शास्त्रों की बात होगी जिन्हें लोगों ने विकृत करने का कुत्सित प्रयास किया है, साथ ही उनके सम्पूर्ण समाधान पर भी व्यापक चर्चा होगी। हम सब जानते हैं कि हमारा सनातन वांग्मय यद्यपि अगाध है, निष्कलंक है परंतु मध्यकाल के थपेड़ों, विदेशी आक्रांताओं, कुटिल षड्यंत्रकारियों और संकीर्ण मानसिकता के कारण हमारे मूल ग्रंथों में भी ऐसी भ्रामक बातें मिला दी गईं जो ऋषियों के मूल चिंतन, सामाजिक समरसता तथा विश्व कल्याण की भावना के विपरीत है। इन मिलावटों को आधार बनाकर हमारी महान संस्कृति को बदनाम करने का कुत्सित षड्यंत्र और प्रयास चल रहा है। हमारे पूज्य संतगण और समाज के विद्वतजनों के द्वारा ही हमारी संस्कृति और उसके गौरव को पुन: प्रतिष्ठापित किया जा सकता है। निश्चित रूप से वाक्य, तर्क, न्याय सार्वभौमिक सत्य की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है तो ऋषि वचन या शास्त्र सम्मत नहीं हो सकता।

आचार्य जी ने बताया कि श्रद्धेय स्वामी जी के नेतृत्व में पतंजलि से नवीन शास्त्र निर्माण का बड़ा कार्य किया जा रहा है। पतंजलि ने अनेक विद्वानों के सहयोग से लाखों श्लोकों की रचना करके आयुर्वेद, योग, वनस्पति तथा आयुर्वेद के निदान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। शास्त्र और वर्तमान समय के बीच के गैप या उस दूरी को समाप्त करने का कार्य भी पतंजलि से किया जा रहा है। पतंजलि विश्वविद्यालय इस पावन संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है कि हम आधुनिक विज्ञान की दृष्टि और सनातन की प्रज्ञा से इस राष्ट्र का पुन: निर्माण करेंगे। ऋषियों के मूल ज्ञान को हम अकाट्य मानते हैं, किंतु उनके नाम पर समाज में थोप दी गईं कुरीतियों और मिलावटी श्लोकों को प्राच्य विद्या का मूल संदेश नहीं मानना चाहिए।

सम्मेलन के अध्यक्ष और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी जी ने कहा कि जब विदेशी लोग भारत में अध्ययन के लिए आए तो विस्मृत हो गए, प्रथम दृष्टि में भारत उनकी समझ में आया ही नहीं। तब भारतीय विद्वानों सोचा की इससे कहीं भारत की विरूपता न हो जाए और इसी उद्देश्य से उन्होंने अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ किया। आजादी से पहले अंग्रेजी शासन के समय से इसे ऑल इण्डिया ऑरिएंटल कांफ्रेंस कहा जाता रहा है लेकिन यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे देखना है तो भारतीय दृष्टि को भी उसमें शामिल करना होगा अन्यथा भारत का अपूर्ण व अखण्ड दर्शन ही होगा। उन्होंने प्रस्ताव रखते हुए इसमें संशोधन की मांग की और कहा कि आज वह अवसर है कि हम ऑरिएंटल शब्द के स्थान पर प्राच्य विद्या शब्द का प्रयोग करेें। हमें प्राच्य विद्या से भी आगे भारत विद्या की ओर जाना है।

अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद की महासचिव प्रो. कविता होले जी ने AIOC की गौरवशाली परम्परा को बताते हुए कहा कि यह भारत की समृद्ध, प्राचीन एवं समुज्ज्वल परम्परा का एक गौरवशाली मंच है। उन्होंने बताया कि परिषद की स्थापना का उद्देश्य भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा, संस्कृत साहित्य, भारतीय दर्शन, इतिहास, धर्म अभिलेखों, पाण्डुलिपियों को व्यवस्थित एवं अनुसंधान को प्रोत्साहित करना है।

इस अवसर पर राज्यपाल महोदय द्वारा भारतीय दर्शनों का इतिहास एवं मीमांसा, वेदामृत एवं भारतीय दर्शन बोध पुस्तकों का विमाेचन भी किया गया।

 

*शास्त्रार्थ विशेष पैनल और शोध-पत्र प्रस्तुतियों से समृद्ध हुआ सम्मेलन*

29 से 31 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस सम्मेलन में पूर्ण सत्रों के साथ विशेष पैनल चर्चाएं, शोध-पत्र प्रस्तुतियां, पोस्टर प्रस्तुतियां तथा महर्षि पतंजलि सभा और ब्रह्मवादिनी सभा जैसे समानांतर सत्र आयोजित किए गए। प्रथम दिवस के कार्यक्रम में प्रातः योगगुरु स्वामी रामदेव जी महाराज के सान्निध्य में योग सत्र, पुस्तक मेले का उद्घाटन, सम्मेलन का उद्घाटन एवं प्रथम पूर्ण सत्र शामिल रहे। अपराह्न में ‘मूल स्वामिनारायण दर्शन’ विषय पर विशेष पैनल चर्चा के साथ विभिन्न शोध-पत्र एवं पोस्टर प्रस्तुतियां आयोजित की गईं।

इन सत्रों में संस्कृत, वेद, दर्शन, इतिहास, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान-विरासत के प्रामाणिक अध्ययन को प्रोत्साहित करना, संस्कृत के संवर्धन को गति देना तथा पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा एवं अनुसंधान से जोड़ना है।

कार्यक्रम की शुरूआत राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन द्वारा भव्य पुस्तक मेले का उद्घाटन किया गया। पुस्तक स्टॉलों से सजे इस मेले में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य, दर्शन, वैदिक वांग्मय, आयुर्वेद और प्राच्यविद्या से संबंधित पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया।

कार्यक्रम में आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी, अध्यक्ष, भारतीय विद्वत परिषत, श्री गणेश उमाकांत थीटे, प्रो. शिवानी, संयुक्त सचिव, एआईओसी तथा 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया जी, मानवीकि संकायाध्यक्ष श्री मयंक अग्रवाल जी, पतंजलि परिवार के वरिष्ठ सदस्यगण, संन्यासी भाई, संन्यासिनी बहनें, समस्त ईकाई प्रमुख, विभागाध्यक्ष, कर्मयोगीगण, पतंजलि विश्वविद्यालय के प्राचार्यगण तथा विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।

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